उसका चेहरा ताज महल सा लगता हैं ,
उसकी जुल्फे काली घटा कहलाती हैं,
उसकी बिंदिया चाँद सी चमकती हैं,
वो मुझे इक परी सी लगती हैं !
उसका आंचल सावन सा लहराता हैं,
उसका चलना नागन सा कहलाता हैं ,
उसकी बाहें जन्नत मुझे लगती हैं ,
वो मुझे इक परी सी लगती हैं !
उसका हँसना दिवाली कहलाता हैं ,
उसका कंगना इन्द्रधनुष की लाली हैं ,
उसकी पायल चिड़ियों सी चेहेकती हैं ,
वो मुझे इक परी सी लगती हैं !
उसके झुमके दो नयन से लगते हैं ,
उसका गजरा मधुवन सा महकता हैं ,
उसका कजरा रात सुहानी लगती हैं ,
वो मुझे इक परी सी लगती हैं !
उसके आंसू रिमझिम सी बरसात हैं,
उसकी बातो में इक मीठी सी प्यास हैं ,
जिसमे सारी बात हे ये ,
वो मेरी घर वाली लगती हैं,
वो मुझे इक पारी सी लगती हैं!