Thursday, 30 August 2012

इक परी सी लगती हैं


उसका चेहरा ताज महल सा लगता हैं ,
उसकी जुल्फे  काली घटा कहलाती हैं,
उसकी बिंदिया चाँद सी चमकती हैं,
वो मुझे इक परी सी लगती हैं !


उसका आंचल सावन  सा लहराता हैं,
उसका चलना नागन सा कहलाता हैं ,
उसकी बाहें जन्नत मुझे लगती हैं ,
वो मुझे इक परी सी लगती हैं !


उसका हँसना दिवाली कहलाता हैं ,
उसका कंगना इन्द्रधनुष की लाली हैं ,
उसकी पायल चिड़ियों सी चेहेकती हैं ,
वो मुझे इक परी सी लगती हैं !


उसके झुमके दो नयन से लगते हैं ,
उसका गजरा मधुवन सा महकता हैं ,
उसका कजरा रात सुहानी लगती हैं ,
वो मुझे इक परी सी लगती हैं !


उसके आंसू रिमझिम सी बरसात हैं,
उसकी बातो  में इक मीठी सी प्यास हैं ,
जिसमे सारी बात  हे ये ,
वो मेरी घर वाली लगती हैं, 

वो मुझे इक पारी सी लगती हैं!

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