प्यार का आखरी पैगाम लिख रहा हूँ
ये ख़त मैं तेरे नाम लिख रहा हूँ
तू सलामत रहे ये सितमगर
दिल का अरमान लिख रहा हूँ
प्यार का आखरी .............
तुझको चाहा था हमदम की तरह
पाक थी तू शबनम की तरह
घर मेरे आयेगी तू दुल्हन की तरह
तेरी डोली उठ जाने के बाद लिख हूँ
प्यार का आखरी................
आके सीने से वो लग जाती थी
झूठी कसमें खाकर मुझे मानती थी
जीना न पाएंगे तेरे बिन
इतना कहकर वो घर चली जाती थी
घर तेरे जाने के बाद लिख रहा हूँ
प्यार का आखरी. .........
चाहा था "मस्ताना" साथ जीना तेरे
मरने के बाद लिख रहा हूँ
प्यार का आखरी............
( जे.पी. मस्ताना )

चाहा था "मस्ताना" साथ जीना तेरे
ReplyDeleteमरने के बाद लिख रहा हूँ
प्यार का आखरी........बहुत .बहुत बहुत .बहुत ...सुंदर..........कितना दर्द है आपकी कविताओं में ........
बहुत सुंदर..........
ReplyDelete